उसके व्याख्यान का विषय था- 'क्षति'। उन्होंने कहा, 'संसार में वह व्यक्ति कुछ भी नहीं प्राप्त कर सकता, जो खोता नहीं। हमारे हाथ अनायास ही जो कुछ लग जाता है, उन्हें हम पूरे तौर पर प्राप्त नहीं कर सकते; लेकिन उसके त्याग के द्वारा हम जब उसे प्राप्त करते हैं तो वह सचमुच हमारे अंतर का धन हो जाता है। प्रकृत रूप से हमें जो संपदा प्राप्त है, वह हमारी आँखों से दूर हो जाए और जो व्यक्ति इसे हमेशा के लिए खो दे, वह अभागा ही है। लेकिन मानव के हृदय में उसे त्यागकर, उसे और अधिक मात्ना में पाने की क्षमता है। मुझसे जो दूर जा रहा है, उसके बारे में अगर हम विनत भाव से, कर-बद्ध होकर यह कह सकें कि 'मैंने दिया, अपने त्याग का दान दिया, अपने दुख का दान दिया, अपने अश्रुओं का दान दिया' तो क्षुद्र ही विराट हो उठता है, अनित्य नित्य रूप हो जाता है और जो हमारे व्यवहार के उपकरण मात्न थे, वे पूजा के साधन बनकर हमारे अंतःकरण के देव मंदिर के रत्न-भंडार में चिरसंचित रहते हैं।